Sunday, August 23, 2009

ईंधन

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी

हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे

आँख लगाकर - कान बनाकर

नाक सजाकर -

पगड़ी वाला, टोपी वाला

मेरा उपला -

तेरा उपला -

अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से

उपले थापा करते थे


हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर

गोबर के उपलों पे खेला करता था

रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था

हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे

किस उपले की बारी आयी

किसका उपला राख हुआ

वो पंडित था -

इक मुन्ना था -

इक दशरथ था -

बरसों बाद - मैं

श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ

आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में

इक दोस्त का उपला और गया!

अमलतास

खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था

वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था

शाखें पंखों की तरह खोले हुए

एक परिन्दे की तरह

बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर

सब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसको

और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के

बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!

आंधी का हाथ पकड़ कर शायद

उसने कल उड़ने की कोशिश की थी

औंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!!

त्रिवेणी

मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी
मुझेआज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे

सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा(भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें
सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।

सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी
कीमुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर
कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!

लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर
यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है कोई?

आप की खा़तिर अगर हम लूट भी लें आसमाँ
क्या मिलेगा चंद चमकीले से शीशे तोड़ के!
चाँद चुभ जायेगा उंगली में तो खू़न आ जायेगा

तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ गई घर में!
कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!

कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी,जेब में इतने दाम नहीं थे
ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।

चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था
बहुत कहा आवारा उल्काओं की संगत ठीक नहीं!

नाप के वक्‍़त भरा जाता है ,रेत घड़ी में-
इक तरफ़ खा़ली हो जबफिर से उलट देते हैं उसको
उम्र जब ख़त्म हो ,क्या मुझ को वो उल्टा नहीं सकता?

क्या पता कब कहाँ मारेगी ?
बस कि मैं ज़िंदगी से डरता हूँ
मौत का क्या है, एक बार मारेगी

सब पे आती है सब की बारी से
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं
ज़िंदगी सब पे क्यों नहीं आती ?